Monday, October 17, 2022

एक दिन

खुद से छिप कर ऐसा करना एक दिन,

मुझसे छिप कर मुझसे मिलना एक दिन!


सच की उस चिलमन से निकलना एक दिन,

संग मेरे गलियों में भटकना एक दिन!


मैं चला जाऊं भी अगर इस बज़्म से,

तुम मुझे फिर से बुलाना एक दिन।


याद मेरी आये तुमको के नहीं,

तुम मेरे ख्वाबों मे आना एक दिन।


शिकवे कुछ सच्चे से और कुछ झूठ भी,

खूब करना और रुलाना एक दिन।


डूबता सूरज हो और मद्धम रोशनी,

नदिया किनारे मिलने आना एक दिन। 

_कुश शर्मा

8 comments:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २१ अक्टूबर २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

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    1. हृदय से आभार ! आशा है आप अपने ब्लौग पर आते रहेंगे!

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २१ अक्टूबर २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  4. मुझसे छिप कर मुझसे मिलना एक दिन!
    वाह!!!
    क्या बात...
    शिकवे कुछ सच्चे से और कुछ झूठ भी,

    खूब करना और रुलाना एक दिन।
    बहुत ही सुंदर।

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    1. कुश शर्मा ( Ktheleo)October 28, 2022 at 6:48 PM

      आपका आभार आशा है ,स्नेह सदा बना रहेगा !

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  5. Replies
    1. संगीता जी आप मेरे ब्लॉग को ' पुन: सराहना मेरा हौसला बढ़ायेगा ! आभार!

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