ख्वाब पलकों के पीछे से चुभने लगे,
मेरा दिलबर मुझे रू-ब-रू चाहिये!
अँधेरा पुतलियों तक पहुँचने लगा,
नूर तेरा मुझे अब चार सू चाहिये!
फ़ूल कागज़ के हैं ये महकते नहीं,
गेसुओं की तेरे मुझको वो बू चाहिये!
आँख से जो गिरा अश्क है बेअसर,
जो लफ़्ज़ों मे हो वो लहू चाहिये!