"सच में!"
दिल की हर बात अब यहाँ होगी, सच और सच बात बस यहाँ होगी
ये सब हैं चाहने वाले!और आप?
Saturday, May 16, 2026
क्या करू ।
Thursday, August 28, 2025
मिट्टी है.
सच में ये ख्वाब,सब मिट्टी है।
सिकन्दर-ओ-सोहराब सब मिट्टी हैं।
ये ज्ञान,वो किताबें सब मिट्टी है।
ये सोने से तुलने का अहसास सब मिट्टी है।
वो मेरा है,मासूम है,आ जायेगा,
दिल की ये आस,छलावा,सब मिट्टी है।
Wednesday, August 27, 2025
कुछ बताओ!
मैं चला जाऊंगा ,मत पुकारो मुझे,
हाथ पकड के बस बिठाओ ज़रा।
दोस्त कुछ इस कदर पराये हैं,
कोई तो जाओ उन्हें बताओ ज़रा।
कभी तो थोडा करी़ब आओ ज़रा,
मैं खु़द को देखूं, नज़र मिलाओ ज़रा।
ज़ख्म मेरे भी गहरे हैं उतने,
इन्हें भुलाओ, मुस्कुराओ ज़रा।
मैं तुम्हें भूल जाऊं कैसे हो,
तुम मगर मुझको याद आओ ज़रा।
_कुश शर्मा
Saturday, July 26, 2025
बस यूंही जरा बात सच की!
कोई जिन्दा मिले ,
तो बताऊं न!
डर कितना , बडा झूठ है!
पर तुम सब तो ,
लडे ही नहीं,
डर से डर गये,
और मर गये!
अब सत्य की शाश्वत शक्ति,
मुर्दे तो नहीं समझ सकते न!
इस लिये, तुम सब जो,
बुद्धिजीवी होने का दावा करते हो,
चीखो, और इससे पहले, कि
सब सच की राह ढूंढ़ने वाले,
झूठ का अंधेरा देख कर,
डर से या अज्ञान से मुर्दा हो जायें,
सत्य को स्वीकार करो,बताओ,
और तब तक चीखो जब तक,
सत्य!
करोड़ों बार बोले गये झूठ पर विजय न पा ले,
और तब छंट जायेगा ,
असत्य का वह तिमिर,
जिसने हमारी जीवन्त समझ को छीन कर,
हमें बना दिया है,
या तो शव अन्यथा,
मृत्यप्राय श्मशान वासी। ©2023 _कुश शर्मा
Thursday, September 28, 2023
मै कौन हूँ?
ये मैं जानता हूँ!
पर मैं वो नहीं हूँ ,
जो मै सब को बताता हूँ!
दरअसल , मैं वो भी नहीं हूँ,
जो मेरे जानने वाले,
मुझे या तुम्हें बताते हैं,
मेरे बारे में!
मैं असल में वही हूँ ,
जो तुम जानते हो,
और मैं भी जानता हूँ,
और मेरे और तुम्हारे,
दोनों के जानने वाले भी!
मगर कोई किसी को ,
बता नहीं पाता,
या शायद बताना नहीं चाहता।
कि दरअसल,
"मैं" हूँ कौन?
©Sept2023 _ कुश शर्मा.
Monday, November 14, 2022
वो क़तरा जो लहू बन के सरकता है,
वो जो गीत धड़कनों में लरजता है,
घडी के काँटों में जो वख़्त बनके खटकता है,
नका़ब बनके जो रूखसार से सरकता है,
घनक बन के कभी बादलों में उभरता है,
बयार बने के कभी,दहलीज़ से गुज़रता है,
अश्क बन जाता है और आँख से छलकता है,
याद बन के कभी फाँस सा खटकता है,
बन के हिचकी कभी हलक़ में अटकता है,
जिस्म बन के कभी पहलू में महकता है,
ख्याब बन के कभी नींद में मटकता है,
बूंद बन के जो कभी जुल्फ से झटकता है,
एक आवारा सा तेरे कूचे में भटकता है,
इश्क है, इश्क है इश्क है।© 2018
किनारे समुन्दर के भरा रेत मुठ्ठी से जो सरकता है,
इश्क है,इश्क है, इश्क ही है। _अभी अभी (2022)
Thursday, November 3, 2022
प्रेम!
बिन चराग का उजाला है प्रेम,
इथोपिआ में ब्रैड का निवाला है प्रेम,
सूफ़ी के लिये दोहा,मयकश के लिये प्याला
जिसे यकीं है उसका मक्का और शिवाला है प्रेम,
प्रेम को भला बताओ परिभाषित क्यों करना,
अद्भुत है ईश्वर की तरह निराला है प्रेम!
©2011
Monday, October 17, 2022
एक दिन
खुद से छिप कर ऐसा करना एक दिन,
मुझसे छिप कर मुझसे मिलना एक दिन!
सच की उस चिलमन से निकलना एक दिन,
संग मेरे गलियों में भटकना एक दिन!
मैं चला जाऊं भी अगर इस बज़्म से,
तुम मुझे फिर से बुलाना एक दिन।
याद मेरी आये तुमको के नहीं,
तुम मेरे ख्वाबों मे आना एक दिन।
शिकवे कुछ सच्चे से और कुछ झूठ भी,
खूब करना और रुलाना एक दिन।
डूबता सूरज हो और मद्धम रोशनी,
नदिया किनारे मिलने आना एक दिन।
_कुश शर्मा
Saturday, October 15, 2022
काजल तुम्हारा,
काश काजल तुम्हारा,
चाँद की रोशनी को कम कर पाता,
एक दिन तो,
मैं भी ख्वाब
आँखों में सजाना चाहता हूँ!
नींद आने के लिये,
एक दिन तो मिले,
जब रोशनी मेरी पुतलियों को,
जलाये न!
Sunday, July 16, 2017
Saturday, July 15, 2017
छलावा.
तो ये कोई गुनाह तो नहीं,
मैं नफ़रत भी तो नहीं करता,
दरसल वो सब जो कहते हैं, के, वो प्यार करते हैं,
एक छलावे में रहते हैं,
मैं नहीं रहता,
वैसे सच कहूँ तो,
प्यार, गुनाह, नफ़रत,छलावा और "सच",
सब एक हसीन झूठ है।
चन्द मुख्तसर शेर
न मैं तेरे ख्याल जैसा हूँ,
न मैं मेरे सवाल जैसा हूँ,
न मैं तेरे चश्मे तर में हूँ,
न मैं किसी उदास नज़र में हूँ।
मैं हूँ ही नहीं,मुझे तलाश मत,
गर हूँ कहीं तो असर में हूँ!
असर = गुण/ तासीर
असर= बहुत ही आनन्दित
चटक जाता है बिखर जाता है, शीशे का है ये दिल,
क्या फर्क इस बिचारे को कौन था कातिल।
इस कदर वख्त ने घिसा है हमें ,
चमक तो आई,वज़न जाता रहा।
Friday, April 28, 2017
जो बात बताने के लिये
बात शुरू की थी,
क्या पता था,
बातों बातों मे वो बात भी आ जायेगी,
जिसे बताने से,
बात बिगड आयेगी ,
मगर,
गम इस बात का है,
कि वो बात जो बतानी थी,
मगर भूल गया,
वही बात
उन्हें बुरी लगी शायद!
मेरा महबूब बिना बात के खफ़ा नहीं होता."
Monday, March 27, 2017
Tuesday, August 9, 2016
दिल की कही।
कोई ऐसा भी हो जो चुन लाये मुझको ।
कोई तो रोके, ज़रा पास बिठाये मुझको।
कोई तो बोले कभी, कोई बताये मुझको ।
बनाके अश्क कोइ पलकों पे सजाये मुझको|
Tuesday, November 11, 2014
एक दिन
दोपहर बीते
आना!
नहीं,
तब तो मैं
होश में आ चुका होता हूँ।
सारे मिथक,
और सच
उजागर कर दूँगा,
हाँ मगर,
अकेले नहीं!
साथ में हो तुम्हारे,
वो भी
एकदम
नंग धडंग
जैसे पैदा हुये थे वो!
Friday, April 4, 2014
व्हाइट वाला’ब्लैक बोर्ड’
शब्द अपने मतलब,खोते जा रहे हैं!
बातों का जंगल घना हो चला है,
लोग फ़िर भी लफ़्ज़, बोते जा रहे हैं!
सुबुह का सूरज भी बूढा हो चला है,
लोग जगते ही नहीं, सोते जा रहे हैं!
अब चलों मझधार में ही घर बना लो,
सब किनारे, कश्तियाँ, डुबोते जा रहे है!
मुस्कुराहटें भी कुछ कुछ ग़मज़दा हैं,
अश्क भी रोते बिलखते आ रहें है!
Sunday, February 2, 2014
ज़िन्दगी!
पानी की धार
ज़िन्दगी,
जून की दोपहर में,
चढता बुखार
ज़िन्दगी,
जागी आँखों में,
नींद का खुमार
ज़िन्दगी,
खुशी और ग़म की,
भरी आँखों के,
ज़िन्दगी,
एक नये साज़ के,
टूटे से तार,
ज़िन्दगी,
सूखी फ़सल के बाद,
लाला का उधार,
ज़िन्दगी,
भूखे पेट,चोटिल जिस्म को,
माँ का दुलार ,
बनावट के दौर में,
होना आँखों का चार,
ज़िन्दगी,
एक ख़फ़ा दोस्त की,
अचानक पुकार,
ज़िन्दगी,
Monday, January 6, 2014
Sunday, December 1, 2013
इश्क एक हादसा
एक दम वैसा ही,
जैसे,
मन के शीशे को,
बेचैनी के पत्थर से,
किरच किरच में ,पसार देना,
और फ़िर,
लहू लुहान हथेलियों को,
अश्क के मरहम से देना,
’मसर्रत’!
और कौन?
फ़िर,अपने आपसे पूछना भी!"
Wednesday, November 20, 2013
ठहराव!
किसी भी इंसा के लिये,
चलते चलते,रूक जाना
खुद ब खुद!
थक कर चूर,
कुछ मुसलसल चलने वाले
चाहते थे रूकना!
कभी,छाँव न मिली,
कभी रास न आया थकना।
मेंने कहा,अब रूक भी जाओ,
कोई,इक थोडी देर,
बस यूँ ही ज़रा,
वो बोले,
मगर कैसे?
जैसे,खोल दे कोई,
बंद मुठृठी को, मैंने कहा
वो बोले,घबराकर,
मगर कैसे?
सच में कितना मुश्किल होता है,
जिन्दगियों का आसां होना।
रूके कोई क्यूं,
मौत के आगोश,से,
पहले भला!
चलते रहने का,क्यूँ
यूँ हीं चले ये सिलसिला?
Saturday, September 21, 2013
फ़क़ीरी
गुलों के जख्म जिगर में छुपाये फिरता हूँ!
कभी ज़ुल्फ़ों की छाँव में भी पैर जलते हैं
कभी सेहरा को भी सर पे उठाये फ़िरता हूँ!
अजीब फ़िज़ा है शहर की ये मक़तल जैसी
बेगुनाह हूँ मगर मूँह छुपाये फ़िरता हूँ!
लूट लेंगे सब मिल कर शरीफ़ लोग है ये,
शहर-ए- आबाद में फ़कीरी बचाये फ़िरता हूँ!
Sunday, August 18, 2013
औरत और दरख्त!
मुझे नज़र नहीं आता,
क्या मेरी बात पे
आपको यकीं नहीं आता!
तो गौर फ़रमाएं,
मैं गर गलत हूँ!
तो ज़ुरूर बतायें
दोनों दिन में खाना बनाते हैं
एक ’क्लोरोफ़िल’ से,
और दूसरी
गर कुछ पकाने को न हो,
तो सिर्फ़ ’दिल’ से!
एक रात को CO2 से साँस बनाये है,
दूसरी हर साँस से आस लगाये है,
पेड की ही तरह ,
औरत मिल जायेगी,
हर जगह,
खेत में, खलिहान में,
घर में, दलान में,
बस्ती में,श्मशान में,
हाट में, दुकान में,
और तो और वहाँ भी,
जहाँ कॊई पेड नहीं होता,
’ज़िन्दा गोश्त’ की दुकान में!
अब क्या ज़ुरूरी नहीं दोनों को बचाना?
Thursday, August 8, 2013
चाँद! ईद का!
ईद का हो!
दूज का हो!
हो पूनम का!
या,
चेहरा सनम का!
चाँद तो चाँद है.
_कुश शर्मा.
मगर ये भी याद रखना है ज़ुरूरी,
"धूप लाख मेहरबाँ हो,मेरे दोस्त,
धूप, धूप होती है,चाँदनी नहीं होती"
_शायर (न मालूम)
Saturday, July 27, 2013
दुआ का सच!
कौन ऐसा है,यहाँ जो मुझको वफ़ा देता है!
ये बारिशें भी कब यहाँ साल भर ठहरतीं है,
हर नया मौसम मिरे ज़ख्मों को हवा देता है।
तेरी बातें न करूँ मैं, अगर दीवारों से,
है कोई काम?जो दीवानों को मज़ा देता है!
दुश्मनों से ही है अब एक रहम की उम्मीद,
है कोई दोस्त, जो, मरने की दुआ देता है?
Tuesday, July 16, 2013
गाल का तिल!
तेरी जुदाई के सदमें से,
और भूल भी जाता तुझको,
मगर कुदरत की नाइंसाफ़ियों का क्या करूँ?
तुझे याद भी नहीं होगा,
वो ’मेरे’ गाल का तिल,
जिसे चूमते हुये,
तूने दिखाया था,
अपने गाल का तिल!
Sunday, June 30, 2013
तलाश एक अच्छे इन्सान की।
यूँ ही,
कल रात,
बेसाख्त: लगा ढूँडने
एक अच्छा इन्सान,
रात काफ़ी हो गई थी,
और थी थोडी थकान,
फ़िर भी
मन के फ़ितूर को
शान्त करना भी था
"ज़रूरी"
अब मेरी आदत कह लीजिये,
या यूँ ही!
दफ़्तन ’दस्तूरी’
मैंने कहा क्यूँ कहीं और जायें?
क्यों न अपने पहलू में ही गौर फ़र्मायें!
जा मिला मैं आईने से!
और पूछा ,
है भला कोई यहाँ!
मुझसे ’भला’?
एक आवाज़ कहीं दूर से,
आई या वहम के बाइस सुनाई दी!
"बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा न मिलया कोय
जब घट देखा आपना,
मुझ से बुरा न कोय"
कबीर साहब,
इतना ’सच’ किस काम का!
के जीना ही दुश्वार हो जाये!
केदारनाथ की जय हो!
"मैं तो नूर बन के तेरे दीदों में रहता था,
तोड दीं जो तूने उन उम्मीदों में रहता था!"
"जब तक पूजते रहे तो पत्थर में भी खुदा थे,
जब से बिके बाज़ार में,शिव पत्थर के हो गये!
"जब ज़र्रे ज़र्रे में मैं हूँ तो पत्थर में क्यों नहीं,
अज़ाब* भी तो मेरा रंग है,मेरे घर में क्यूँ नहीं?
और एक नज़र हकीम ’नासिर’ साहिब के दो शेर जो केदारनाथ धटनाक्रम पर सटीक बात कहते नज़र आते हैं
I hope Kedarnath (भगवान केदारनाथ) is listening too,
"पत्थरों आज मेरे सर पे बरसते क्यूँ हो,
मैंने तुम को भी कभी अपना खुदा रक्खा है।"
And for the victims at Kedarnath
"पी जा अय्याम की तल्खी को भी हँस के ’नासिर’
ग़म को सहने में भी कुदरत ने मज़ा रक्खा है!"
************************************* अज़ाब = पीड़ा, सन्ताप, दंड
Friday, May 31, 2013
बुत और खुदा!
मेरे सब्र की ज़मीं ने हर मौसम को बदलते देखा है।
अब ऐसी नींद भी खुदा किसी को न अता करे,
मैंने अक्सर अपनी रुह को ख्वाबों में जलते देखा है।
वख़त बुरा आये तो कभी दोस्तों को मत ढूँडो,
अँधेरी रात में कभी,साये को साथ देखा है?
हर चमकती सुबह को स्याह रात में ढलते देखा है,
हमने अपने खुदाओ को अक्सर बुत में बदलते देखा है।
Friday, April 5, 2013
आदमी और चींटियाँ!
मेरे दादा जी,
सवेरे चींटियों को,
आटा खिलाने जाते थे!
मेरे पिता जी
जब सवेरे बाहर जाते थे,
तो चींटिंयाँ,
पैरों से न दब जायें
इस का ख्याल रखते थे,
मैं जब walk करता हूँ,
तो चीटियाँ
दिखती ही नहीं!
मेरा बेटा सवेरे
उठता ही नहीं,
पता नहीं क्या हो गया है?
इंसान,
चीटिंयों,
नज़र
और समय को!
Saturday, March 30, 2013
नींद की गठरी!
फिर कलेजा चाक हो,या पीठ में खंजर मिले!
मेरी बरबादी की खातिर,दुश्मनी कम पड गई,
दिल में यारों को बसाया,उसके बस खंडहर मिले!
मैंने समझा था गुलों की सेज,तुरबत को मगर,
कब्र में जा कर भी बस,बदनामी के नश्तर मिले।
लोग लेकर चल पडे थे,सामाँ मसर्रत के सभी,
नींद की गठरी नहीं थी,खाली उन्हे बिस्तर मिले।
Tuesday, March 26, 2013
Friday, March 15, 2013
ख्वाहिशें
ख्वाब पलकों के पीछे से चुभने लगे,
मेरा दिलबर मुझे रू-ब-रू चाहिये!
अँधेरा पुतलियों तक पहुँचने लगा,
नूर तेरा मुझे अब चार सू चाहिये!
फ़ूल कागज़ के हैं ये महकते नहीं,
गेसुओं की तेरे मुझको वो बू चाहिये!
आँख से जो गिरा अश्क है बेअसर,
जो लफ़्ज़ों मे हो वो लहू चाहिये!
Sunday, March 10, 2013
अफ़साना-ए-वफ़ा
कभी करना न भरोसा,
दिल की लन्तरानी पे
ये वो सराब हैं,
जो सरे सहरा ,
तेरी तिश्नगी को
धूप के हवाले करके,
तुझे आँसुओं की शबनम के सहारे छोड जायेगा,
औ दर्द तेरा
सबब बन जायेगा,
कहकहों का,
ज़माना सिर्फ़ तेरी नाकामयाब मोहब्बतों को
कहानियों में सुनायेगा !
ऐ दिल-ए- नादाँ,
सम्भल,
इश्क कभी वफ़ा वालों को, मिला है अब तक?
तेरा अफ़साना भी
माज़ी के वर्कॊं में दबाया जायेगा.
Saturday, March 9, 2013
खता किसकी!
तेरा घर मेरी गली के मोड पे था, रास्ते भला कैसे जुदा हो पाते?
Monday, December 31, 2012
साल नया है!
साल नया है,
अगर कल का अखबार शर्मिदा न करे! तो!
मान लूँगा,
अगर 01 जनवरी 2013 की शाम को कोई भी हिन्दुस्तानी भूखा न सोये!
मान लूँगा,
तुम सब अगर कसम खाओ के कम से कम आज कोई घूस नहीं खायेगा!
मान लूँगा,
अगर तुम मान लोगे कि ,
सिर्फ़ अपने अतीत में रहने वाली कौमें,कायम नहीं रह पातीं!
मैं कैसे मान लूँ साल नया है?
क्यों कि न नौ मन तेल होगा, और न राधा नाचेगी!
नाचे कैसे?
कैसे?
नाचे तो!
पर,
राधा को जीने दोगे तब न?
Tuesday, November 13, 2012
मशालें!
रूहों के तकाज़े,
इंसान लिये फिरते हैं,
खुद अपने ज़नाजे।
हाथों में मशालें,
अँधों से है उम्मीद
के वो पढ लें रिसाले!
कैसे पार लगें हम,
लहरों की तरफ़ देखें,
या कश्ती को संभालें!
Saturday, October 27, 2012
चाँद और तुम!
रात के पिछ्ले प्रहर
चाँद उतर आया था,
यूँ ही,
मैंने तुम्हारा नाम लेकर
पुकार था,
उसको ,
अच्छा लगा! उसने कहा,
इस नये नाम से पुकारा जाना,
तुम्हें कोई एतराज तो नहीं,
गर मैं रोज़ उस से बातें कर लिया करूँ?
और हाँ उसे पुकारूं तुम्हारे नाम से,
उसे अच्छा लगा था न!
तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा न?
गर चाँद को मैं पुकारूं तुम्हारे नाम से!
Tuesday, August 28, 2012
मुगाल्ता!
वो मेरा नाम सुन के जल गया होगा,
किसी महफ़िल में मेरा ज़िक्र चल गया होगा!
उसकी बातों पे एतबार मत करना,
सच बात जान के बदल गया होगा!
तुमने नकाब उठाया ही क्यों,
दिल नादान था मचल गया होगा!
मौसम बारिशो का अभी बाकी है,
रुख हवाओं का बदल गया होगा!
रास्ते सारे गुम हो गये होगें,
वो फ़िर भी घर से निकल गया होगा!
Tuesday, July 31, 2012
इश्क-ए-बेपनाह!
मैं और करता भी क्या,
वफ़ा के सिवा!
मुझको मिलता भी क्या,
दगा के सिवा!
बस्तियाँ जल गई होंगी,
बचा क्या धुआँ के सिवा!
अब गुनाह कौन गिने,
मिले क्या बद्दुआ के सिवा!
कहाँ पनाह मिले,
बुज़ुर्ग की दुआ के सिवा!
दिल के लुटने का सबब,
और क्या निगाह के सिवा!
ज़ूंनून-ए-तलाश-ए-खुदा,
कुछ नही इश्क-ए-बेपनाह के सिवा!
Wednesday, July 4, 2012
मैं और मेरा खुदा!
घुमड रहा है,
गुबार बन के कहीं,
अगर तू सच है तो,
ज़ुबाँ पे आता क्यों नही?
![]() |
| "ईश्वरीय कण" |
सच अगर है तो,
तो खुद को साबित कर,
झूंठ है तो,
बिखर जाता क्यों नहीं?
आईना है,तो,
मेरी शक्ल दिखा,
तसवीर है तो,
मुस्कुराता क्यों नहीं?
मेरा दिल है,
तो मेरी धडकन बन,
अश्क है,
तो बह जाता क्यों नहीं?
ख्याल है तो कोई राग बन,
दर्द है तो फ़िर रुलाता,
क्यों नही?
बन्दा है तो,
कोई उम्मीद मत कर,
खुदा है तो,
नज़र आता क्यों नहीं?
बात तेरे और मेरे बीच की है,
चुप क्यों बैठा है?
बताता क्यों नहीं?
Tuesday, June 26, 2012
आज का अर्थशास्त्र!
मिल के धरती को चलो
जन्नत बनायें,
खुद निरक्षर,
मगर ज्ञान छाटें,
डिग्रियाँ बाँटें, बच्चों को भरमायें
आओ चलो पैसे कमायें
Tuesday, May 29, 2012
Sunday, April 22, 2012
निर्मल सच
अपनी नज़रों से जब जब मैं गिरता गया,
मेरा रुतबा ज़माने में बढता गया!
मेरे अखलाक की ज़बरूत घटती गई,
पैसा मेरी तिजोरी में बढता गया!
मेरे होंठों से मुस्कान जाती रही,
मेरा एहतिराम महफ़िल में बढता गया!
सब सितारे मुझे मूहँ चिढाते रहे,
मैं सिम्त-ए-तारीकी बढता गया!
Friday, April 13, 2012
रंग-ए-महफ़िल
चोट खा कर मुस्कुराना चाहता हूँ,
क्या करूँ रिश्ते निभाना चाह्ता हूँ!
ये रंगत-ए- महफ़िल तो कुछ ता देर होगी,
मैं थक गया हूँ घर को जाना चाहता हूँ!
तुम मेरी यादों में अब हर्गिज़ न आना,
मैं भी तुम को भूल जाना चाहता हूँ!
चल पडा हूँ राह-ए-शहर-ए-आबाद को अब,
आदमी हूँ मैं भी इक घर बसाना चाह्ता हूँ!
बस करो अब और न तोहमत लगाओ,
मैं भी एक माज़ी सुहाना चाहता हूँ!
PS:
न जाने क्युँ जब कि आप सब पढने वलों ने इतनी तव्व्जों से पढा और सराहा है, दिल में आता कि, आखिरी से पहले वाला शेर कुछ ऐसे कहा जाये-
"चल पडा हूँ राह-ए-शहर-ए-आबाद को मैं ,
आशिक तो हूँ पर इक घर बसाना चाह्ता हूँ!"
Thursday, March 22, 2012
चेहरे!
चेहरे!
अजीब,
गरीब,
और हाँ, अजीबो गरीब!
मुरझाये,
कुम्हलाये,
हर्षाये,
घबराये,
शर्माये,
हसींन,
कमीन,
बेहतरीन,
नये,
पुराने
जाने,
पहचाने,
और हाँ ’कुछ कुछ’ जाने पहचाने,
अन्जाने,
बेगाने,
दीवाने
काले-गोरे,
और कुछ न काले न गोरे,
कुछ कि आँखों में डोरे,
कोरे,
छिछोरे,
बेचारे,
थके से,
डरे से,
अपने से,
सपने से,
मेरे,
तेरे,
न मेरे न तेरे,
आँखें तरेरे,
कुछ शाम,
कुछ सवेरे,
घिनौने,
खिलौने,
कुछ तो जैसे
गैईया के छौने,
चेहरे ही चेहरे!
पर कभी कभी,
मिल नही पाता,
अपना ही चेहेरा!
अक्सर भाग के जाता हूँ मैं,
कभी आईने के आगे,
और कभी नज़दीक वाले चौराहे पर!
हर जगह बस अक्श है,परछाईं है,
सिर्फ़ भीड है और तन्हाई है !
Thursday, February 23, 2012
सजा इंसान होने की !
मेरे तमाम गुनाह हैं,अब इन्साफ़ करे कौन.
कातिल भी मैं, मरहूम भी मुझे माफ़ करे कौन.
दिल में नहीं है खोट मेरे, नीयत भी साफ़ है,
कमज़ोरियों का मेरी, अब हिसाब करे कौन.
हर बार लड रहा हूं मै खुद अपने आपसे,
जीतूंगा या मिट जाऊंगा, कयास करे कौन.
मुदद्दत से जल रहा हूं मै गफ़लत की आग में,
मौला के सिवा, मेरी नज़र साफ़ करे कौन.
गर्दे सफ़र है रुख पे मेरे, रूह को थकान,
नफ़रत की हूं तस्वीर,प्यार बेहिसाब करे कौन.
Friday, January 27, 2012
Please! इसे कोई न पढे! चुनाव सर पर हैं!
थाली के बैगंन,
लौटे,
खाली हाथ,भानुमती के घर से,
बिन पैंदी के लोटे से मिलकर,
वहां ईंट के साथ रोडे भी थे,
और था एक पत्थर भी,
वो भी रास्ते का,
सब बोले अक्ल पर पत्थर पडे थे,
जो गये मिलने,पत्थर के सनम से,
वैसे भानुमती की भैंस,
अक्ल से थोडी बडी थी,
और बीन बजाने पर,
पगुराने के बजाय,
गुर्राती थी,
क्यों न करती ऐसा?
उसका चारा जो खा लिया गया था,
बैगन के पास दूसरा कोई चारा था भी नहीं,
वैसे तो दूसरी भैंस भी नहीं थी!
लेकिन करे क्या वो बेचारा,
लगा हुया है,तलाश में
भैंस मिल जाये या चारा,
बेचारा!
बीन सुन कर
नागनाथ और सांपनाथ दोनो प्रकट हुये!
उनको दूध पिलाने पर भी,
उगला सिर्फ़ ज़हर,
पर अच्छा हुआ के वो आस्तीन में घुस गये,
किसकी? आज तक पता नहीं!
क्यों कि बदलते रहते है वो आस्तीन,
मौका पाते ही!
आयाराम गयाराम की तरह।
भानुमती के पडोसी भी कमाल के,
जब तब पत्थर फ़ेकने के शौकीन,
जब कि उनके अपने घर हैं शीशे के!
सारे किरदार सच्चे है,
और मिल जायेंगे
किसी भी राजनीतिक समागम में
प्रतिबिम्ब में नहीं,
नितांत यर्थाथ में।
Monday, January 23, 2012
उसका सच! एक बार फ़िर!
मुझे लग रहा है,पिछले कई दिनों से ,



