ये सब हैं चाहने वाले!और आप?

Friday, April 5, 2013

आदमी और चींटियाँ!



मेरे दादा जी, 

सवेरे चींटियों को,


आटा खिलाने जाते थे!

मेरे पिता जी

जब सवेरे बाहर जाते थे,


तो चींटिंयाँ, 


पैरों से न दब जायें


इस का ख्याल रखते थे,



मैं जब walk करता हूँ,


तो चीटियाँ


दिखती ही नहीं!



मेरा बेटा सवेरे

उठता ही नहीं,




पता नहीं क्या हो गया है?



इंसान,


चीटिंयों,


नज़र

और समय को!


Saturday, March 30, 2013

नींद की गठरी!

दोस्ती का देखने को,अब कौन सा मंज़र मिले,
फिर कलेजा चाक हो,या पीठ में खंजर मिले!


मेरी बरबादी की खातिर,दुश्मनी कम पड गई,
दिल में यारों को बसाया,उसके बस खंडहर मिले!


मैंने समझा था गुलों की सेज,तुरबत को मगर,
कब्र में जा कर भी बस,बदनामी के नश्तर मिले।


लोग लेकर चल पडे थे,सामाँ मसर्रत के सभी,
नींद की गठरी नहीं थी,खाली उन्हे बिस्तर मिले।