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Tuesday, July 16, 2013

गाल का तिल!

मैं कब का,निकल आता 

तेरी जुदाई के सदमें से,

और भूल भी जाता तुझको,

मगर कुदरत की नाइंसाफ़ियों का क्या करूँ?

तुझे याद भी नहीं होगा,


वो ’मेरे’ गाल का तिल,


जिसे चूमते हुये,


तूने दिखाया था,


अपने गाल का तिल!

Sunday, June 30, 2013

तलाश एक अच्छे इन्सान की।


यूँ  ही,
कल रात,
बेसाख्त: लगा ढूँडने
एक अच्छा इन्सान,

रात काफ़ी हो गई थी,
और थी थोडी थकान,

फ़िर भी
मन के फ़ितूर को
शान्त करना भी था 
"ज़रूरी"

अब मेरी आदत कह लीजिये,
या यूँ ही!
दफ़्तन ’दस्तूरी’

मैंने कहा क्यूँ कहीं और जायें?
क्यों न अपने पहलू में ही गौर फ़र्मायें!

जा मिला मैं आईने से!
और पूछा ,
है भला कोई यहाँ!

मुझसे ’भला’?

एक आवाज़ कहीं दूर से,
आई या वहम के बाइस सुनाई दी!

"बुरा जो देखन मैं चला,
बुरा न मिलया कोय
जब घट देखा आपना,
मुझ से बुरा न कोय"

कबीर साहब,
इतना ’सच’ किस काम का!
के जीना ही दुश्‍वार हो जाये!