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Sunday, December 1, 2013

इश्क एक हादसा

"इश्क एक हादसा!

एक दम वैसा ही,


जैसे,

मन के शीशे को,


बेचैनी के पत्थर से,


किरच किरच में ,पसार देना,


और फ़िर,


लहू लुहान हथेलियों को,


अश्क के मरहम से देना,


’मसर्रत’!


और कौन?


फ़िर,अपने आपसे पूछना भी!"

Wednesday, November 20, 2013

ठहराव!

कितना मुश्किल है,
किसी भी इंसा के लिये,
चलते चलते,रूक जाना
खुद ब खुद!

थक कर चूर,
कुछ मुसलसल चलने वाले
चाहते थे रूकना!
कभी,छाँव न मिली,
कभी रास न आया थकना।

मेंने कहा,अब रूक भी जाओ,
कोई,इक थोडी देर,
बस यूँ ही ज़रा,
वो बोले,
मगर कैसे?


जैसे,खोल दे कोई,
बंद मुठृठी को, मैंने कहा

वो  बोले,घबराकर,
मगर कैसे?

सच में कितना मुश्किल होता है,
जिन्दगियों का आसां होना।

रूके कोई क्यूं,
मौत के आगोश,से,
पहले भला!

चलते रहने का,क्यूँ
यूँ हीं चले ये सिलसिला?