मैं चला जाऊंगा ,मत पुकारो मुझे,
हाथ पकड के बस बिठाओ ज़रा।
दोस्त कुछ इस कदर पराये हैं,
कोई तो जाओ उन्हें बताओ ज़रा।
कभी तो थोडा करी़ब आओ ज़रा,
मैं खु़द को देखूं, नज़र मिलाओ ज़रा।
ज़ख्म मेरे भी गहरे हैं उतने,
इन्हें भुलाओ, मुस्कुराओ ज़रा।
मैं तुम्हें भूल जाऊं कैसे हो,
तुम मगर मुझको याद आओ ज़रा।
_कुश शर्मा

बहुत भावपूर्ण और दिल को छू लेने वाली रचना है। कम शब्दों में आपने तन्हाई, अपनापन और यादों की कसक को बहुत सहज ढंग से व्यक्त किया है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
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धन्यवाद!