अपनी ख्वाहिशों के जख्मों का,
ये सब हैं चाहने वाले!और आप?
Saturday, May 16, 2026
क्या करूं!
अपनी ख्वाहिशों के जख्मों का,
Thursday, August 28, 2025
मिट्टी है.
सच में ये ख्वाब,सब मिट्टी है।
सिकन्दर-ओ-सोहराब सब मिट्टी हैं।
ये ज्ञान,वो किताबें सब मिट्टी है।
ये सोने से तुलने का अहसास सब मिट्टी है।
वो मेरा है,मासूम है,आ जायेगा,
दिल की ये आस,छलावा,सब मिट्टी है।
Wednesday, August 27, 2025
कुछ बताओ!
मैं चला जाऊंगा ,मत पुकारो मुझे,
हाथ पकड के बस बिठाओ ज़रा।
दोस्त कुछ इस कदर पराये हैं,
कोई तो जाओ उन्हें बताओ ज़रा।
कभी तो थोडा करी़ब आओ ज़रा,
मैं खु़द को देखूं, नज़र मिलाओ ज़रा।
ज़ख्म मेरे भी गहरे हैं उतने,
इन्हें भुलाओ, मुस्कुराओ ज़रा।
मैं तुम्हें भूल जाऊं कैसे हो,
तुम मगर मुझको याद आओ ज़रा।
_कुश शर्मा
Saturday, July 26, 2025
बस यूंही जरा बात सच की!
कोई जिन्दा मिले ,
तो बताऊं न!
डर कितना , बडा झूठ है!
पर तुम सब तो ,
लडे ही नहीं,
डर से डर गये,
और मर गये!
अब सत्य की शाश्वत शक्ति,
मुर्दे तो नहीं समझ सकते न!
इस लिये, तुम सब जो,
बुद्धिजीवी होने का दावा करते हो,
चीखो, और इससे पहले, कि
सब सच की राह ढूंढ़ने वाले,
झूठ का अंधेरा देख कर,
डर से या अज्ञान से मुर्दा हो जायें,
सत्य को स्वीकार करो,बताओ,
और तब तक चीखो जब तक,
सत्य!
करोड़ों बार बोले गये झूठ पर विजय न पा ले,
और तब छंट जायेगा ,
असत्य का वह तिमिर,
जिसने हमारी जीवन्त समझ को छीन कर,
हमें बना दिया है,
या तो शव अन्यथा,
मृत्यप्राय श्मशान वासी। ©2023 _कुश शर्मा
Thursday, September 28, 2023
मै कौन हूँ?
ये मैं जानता हूँ!
पर मैं वो नहीं हूँ ,
जो मै सब को बताता हूँ!
दरअसल , मैं वो भी नहीं हूँ,
जो मेरे जानने वाले,
मुझे या तुम्हें बताते हैं,
मेरे बारे में!
मैं असल में वही हूँ ,
जो तुम जानते हो,
और मैं भी जानता हूँ,
और मेरे और तुम्हारे,
दोनों के जानने वाले भी!
मगर कोई किसी को ,
बता नहीं पाता,
या शायद बताना नहीं चाहता।
कि दरअसल,
"मैं" हूँ कौन?
©Sept2023 _ कुश शर्मा.
Monday, November 14, 2022
वो क़तरा जो लहू बन के सरकता है,
वो जो गीत धड़कनों में लरजता है,
घडी के काँटों में जो वख़्त बनके खटकता है,
नका़ब बनके जो रूखसार से सरकता है,
घनक बन के कभी बादलों में उभरता है,
बयार बने के कभी,दहलीज़ से गुज़रता है,
अश्क बन जाता है और आँख से छलकता है,
याद बन के कभी फाँस सा खटकता है,
बन के हिचकी कभी हलक़ में अटकता है,
जिस्म बन के कभी पहलू में महकता है,
ख्याब बन के कभी नींद में मटकता है,
बूंद बन के जो कभी जुल्फ से झटकता है,
एक आवारा सा तेरे कूचे में भटकता है,
इश्क है, इश्क है इश्क है।© 2018
किनारे समुन्दर के भरा रेत मुठ्ठी से जो सरकता है,
इश्क है,इश्क है, इश्क ही है। _अभी अभी (2022)
Thursday, November 3, 2022
प्रेम!
बिन चराग का उजाला है प्रेम,
इथोपिआ में ब्रैड का निवाला है प्रेम,
सूफ़ी के लिये दोहा,मयकश के लिये प्याला
जिसे यकीं है उसका मक्का और शिवाला है प्रेम,
प्रेम को भला बताओ परिभाषित क्यों करना,
अद्भुत है ईश्वर की तरह निराला है प्रेम!
©2011
Monday, October 17, 2022
एक दिन
खुद से छिप कर ऐसा करना एक दिन,
मुझसे छिप कर मुझसे मिलना एक दिन!
सच की उस चिलमन से निकलना एक दिन,
संग मेरे गलियों में भटकना एक दिन!
मैं चला जाऊं भी अगर इस बज़्म से,
तुम मुझे फिर से बुलाना एक दिन।
याद मेरी आये तुमको के नहीं,
तुम मेरे ख्वाबों मे आना एक दिन।
शिकवे कुछ सच्चे से और कुछ झूठ भी,
खूब करना और रुलाना एक दिन।
डूबता सूरज हो और मद्धम रोशनी,
नदिया किनारे मिलने आना एक दिन।
_कुश शर्मा
Saturday, October 15, 2022
काजल तुम्हारा,
काश काजल तुम्हारा,
चाँद की रोशनी को कम कर पाता,
एक दिन तो,
मैं भी ख्वाब
आँखों में सजाना चाहता हूँ!
नींद आने के लिये,
एक दिन तो मिले,
जब रोशनी मेरी पुतलियों को,
जलाये न!
Sunday, July 16, 2017
Saturday, July 15, 2017
छलावा.
तो ये कोई गुनाह तो नहीं,
मैं नफ़रत भी तो नहीं करता,
दरसल वो सब जो कहते हैं, के, वो प्यार करते हैं,
एक छलावे में रहते हैं,
मैं नहीं रहता,
वैसे सच कहूँ तो,
प्यार, गुनाह, नफ़रत,छलावा और "सच",
सब एक हसीन झूठ है।
चन्द मुख्तसर शेर
न मैं तेरे ख्याल जैसा हूँ,
न मैं मेरे सवाल जैसा हूँ,
न मैं तेरे चश्मे तर में हूँ,
न मैं किसी उदास नज़र में हूँ।
मैं हूँ ही नहीं,मुझे तलाश मत,
गर हूँ कहीं तो असर में हूँ!
असर = गुण/ तासीर
असर= बहुत ही आनन्दित
चटक जाता है बिखर जाता है, शीशे का है ये दिल,
क्या फर्क इस बिचारे को कौन था कातिल।
इस कदर वख्त ने घिसा है हमें ,
चमक तो आई,वज़न जाता रहा।
Friday, April 28, 2017
जो बात बताने के लिये
बात शुरू की थी,
क्या पता था,
बातों बातों मे वो बात भी आ जायेगी,
जिसे बताने से,
बात बिगड आयेगी ,
मगर,
गम इस बात का है,
कि वो बात जो बतानी थी,
मगर भूल गया,
वही बात
उन्हें बुरी लगी शायद!
मेरा महबूब बिना बात के खफ़ा नहीं होता."
Monday, March 27, 2017
Tuesday, August 9, 2016
दिल की कही।
कोई ऐसा भी हो जो चुन लाये मुझको ।
कोई तो रोके, ज़रा पास बिठाये मुझको।
कोई तो बोले कभी, कोई बताये मुझको ।
बनाके अश्क कोइ पलकों पे सजाये मुझको|
Tuesday, November 11, 2014
एक दिन
दोपहर बीते
आना!
नहीं,
तब तो मैं
होश में आ चुका होता हूँ।
सारे मिथक,
और सच
उजागर कर दूँगा,
हाँ मगर,
अकेले नहीं!
साथ में हो तुम्हारे,
वो भी
एकदम
नंग धडंग
जैसे पैदा हुये थे वो!
Friday, April 4, 2014
व्हाइट वाला’ब्लैक बोर्ड’
शब्द अपने मतलब,खोते जा रहे हैं!
बातों का जंगल घना हो चला है,
लोग फ़िर भी लफ़्ज़, बोते जा रहे हैं!
सुबुह का सूरज भी बूढा हो चला है,
लोग जगते ही नहीं, सोते जा रहे हैं!
अब चलों मझधार में ही घर बना लो,
सब किनारे, कश्तियाँ, डुबोते जा रहे है!
मुस्कुराहटें भी कुछ कुछ ग़मज़दा हैं,
अश्क भी रोते बिलखते आ रहें है!
Sunday, February 2, 2014
ज़िन्दगी!
पानी की धार
ज़िन्दगी,
जून की दोपहर में,
चढता बुखार
ज़िन्दगी,
जागी आँखों में,
नींद का खुमार
ज़िन्दगी,
खुशी और ग़म की,
भरी आँखों के,
ज़िन्दगी,
एक नये साज़ के,
टूटे से तार,
ज़िन्दगी,
सूखी फ़सल के बाद,
लाला का उधार,
ज़िन्दगी,
भूखे पेट,चोटिल जिस्म को,
माँ का दुलार ,
बनावट के दौर में,
होना आँखों का चार,
ज़िन्दगी,
एक ख़फ़ा दोस्त की,
अचानक पुकार,
ज़िन्दगी,
Monday, January 6, 2014
Sunday, December 1, 2013
इश्क एक हादसा
एक दम वैसा ही,
जैसे,
मन के शीशे को,
बेचैनी के पत्थर से,
किरच किरच में ,पसार देना,
और फ़िर,
लहू लुहान हथेलियों को,
अश्क के मरहम से देना,
’मसर्रत’!
और कौन?
फ़िर,अपने आपसे पूछना भी!"


