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Tuesday, November 30

’इश्क और तेज़ाब’

सूर्य की किरणों से ,
क्लोरोफ़िल का शर्करा बनाना!
शुद्ध प्राकृतिक क्रिया है,

इस में कौन सा ज्ञान है,
यह तो साधारण सा विज्ञान का सिद्धांत है!
सौर्य ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तन।

एक दम सही फ़रमाया आपने,
मानव, उसका विज्ञान,एवं विज्ञान का ज्ञान महान है!

कुछ और प्राकृतिक या यूँ कहें,
कभी नैश्रर्गिक कही जाने वाली 
प्रक्रियाओं को विज्ञान की नज़र से देखें!

प्रेम! सुना है आपने,
चाहत, इश्क,लगाव,
मोह्ब्बत,प्यार शायद और भी,
कुछ नाम होंगें 

विज्ञान की नज़र में,
दिमाग के अंदर होने वाला,
एक रासायनिक परिवर्तन का
मानवीय संबंधो पर होने वाल प्रभाव!
एक चलचित्र के नायक के मुताबिक
दिमाग का ’कैमिकल लोचा’!

इसी कैमीकल इश्क के मारे,
कुछ ’तथाकथित’ आशिक,
अपनी ’तथाकथित’ माशूकाओं पर
छिडक डालते हैं ’तेज़ाब’
’वीभत्स प्रेम’
का प्रदर्शन!
...............कैमीकली!

5 comments:

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

ये प्रेम का प्रदर्शन तो है नहीं जी, ये तो हैवानियत का प्रदर्शन है ... और शायद ये भी एक तरह का केमिकल लोचा ही है ...

Shekhar Suman ने कहा…

क्या ये प्रेम है ???
अजी नहीं ये तो पागलपंथी है...ऐसे लोगों को प्रेम का नाम बदनाम करने के कोई हक नहीं है ....

मेरे ब्लॉग पर इस बार..

मुट्ठी भर आसमान...

ktheLeo ने कहा…

जी हाँ! यह उसी पागलपन का एक बेहूदा हिस्सा है, जिस से भारतीय मानस जन गुजरते दिखतें है!सब नहीं पर काफ़ी डरावनी संख्या है इन मानव नुमा अजूबों की!

roli sharma ने कहा…

विज्ञानं की नज़र में " प्रेम" ..एक अलग नजरिया है "अच्छा है" लेकिन तेजाब छिड़कना भी"प्रेम" का ही एक रूप है यह हैरानी की बात है

उपेन्द्र ने कहा…

विज्ञान की नज़र में,
दिमाग के अंदर होने वाला,
एक रासायनिक परिवर्तन का
मानवीय संबंधो पर होने वाल प्रभाव!
एक चलचित्र के नायक के मुताबिक
दिमाग का ’कैमिकल लोचा’!
सोंच रहा हूँ की ये सही ही होगा....बरना जज्बातों का क्या मोल नहीं होता
.
उपेन्द्र

सृजन - शिखर पर ( राजीव दीक्षित जी का जाना )