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Sunday, November 13

कैक्टस


मैने कह दिया था न,

कि कैक्टस कभी भी,

चुभ सकते हैं,

फ़ूल भी कई मौसम गुज़र जाने बाद शायद ही आते हैं,

कैक्टस पर,

हाँ ये ज़रूर है,
जो लोग,

कैक्टस उगाते हैं

घरों में

वो होते हैं ,

विरले,
डिफ़रैंट, हट के , अलग से,
औफ़ बीट

कैक्टस की तरह ही!


दुख पाकर भी क्या कोई,
खुश हो सकता है?

कैक्टस की तरह।


20 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

हाँ ये ज़रूर है,
जो लोग,

कैक्टस उगाते हैं

घरों में

वो होते हैं ,

विरले,
डिफ़रैंट, हट के , अलग से,
औफ़ बीट

कैक्टस की तरह ही!... सच में

indu puri ने कहा…

दुख पाकर भी क्या कोई,
खुश हो सकता है?

कैक्टस की तरह।' इस दुनिया मे रहते हुए वह सीख चूका होता है की दुःख भी जीवन का हिस्सा है और स्थायी नही रहता. जवान मौत के बाद भी क्या आपने उन बारह दिनों के अंदर लोगों को हंसी,मजाक करते, मुस्कराते नही देखा? हमारी मूल प्रवृति खुश रहने वाली बनाई है ईश्वर ने.हम ज्यादा लम्बे समय तक दुखी रह नही सकते.....दुखों का पहाड़ टूटने पर भी.
केक्टस प्रतीक है संघर्ष के बीच अपने अस्तित्व को बनाए रखने का.

indu puri ने कहा…

ऑ माय गोड !रचना पढ़ ली.व्यूज़ दे दिए बाद मे देखा यह किसका ब्लॉग है ?हा हा हा यह तो आप हैं.जिनने मेरे पुराने ब्लॉग उद्धवजी को तब फोलो किया था जब मैं आपकी इस दुनिया मे नई नई थी.वो ब्लॉग ब्लोक हो गया.पर...मुझे आपका नाम याद रहा. लिखने के लिए प्रेरित करने वाले लोगों मे आप भी एक थे सर !यह बात मे कभी नही भूल सकती.मैं बहुत खुश हूँ कि मैंने आपको अनजाने मे ही सही पर...........वापस ढूंढ लिया.हा हा हा

अनुपमा पाठक ने कहा…

दुख पाकर भी क्या कोई,
खुश हो सकता है?

कैक्टस की तरह।
बहुत बड़ा सवाल है... अर्थ का मनन कर अगर हम इंसान भी ऐसे ही सुख दुःख में तठस्थ रहें तो कितना अच्छा हो!

Vivek Rastogi ने कहा…

बहुत कम होते हैं केक्टस की तरह ।

Mamta Bajpai ने कहा…

बहुत अच्छी रचना ..हर परिस्थिति मैं जीने का होसला रखता है केक्टस ..ऊपर से भले ही सख्त कटीला है पर अंदर से होता है कोमल ..

नीरज गोस्वामी ने कहा…

कैक्टस जैसा होना बहुत बड़े जिगरे काम है...हमेशा काँटों सर पर उठाये रखना आसान नहीं होता....

नीरज

indu puri ने कहा…

Ktheleo aur kush दोनों एक ही शख्स के नाम है हा हा हा मेरे कृष्णा ने मुझे यूँ पहले ही मिला दिया था और मैं अनजान थी. क्या बोलूं? उसके' लिए ????
मैं क्थेलियो को ढूंढ रही थी वो एकदम मेरे कृष्णा की तर्ज ही कुश के रूप मे मुझसे बात भी कर रहा था और मेरी मदद भी ..... मैं जाने किस दुनिया मे थी.कुश! एक अद्भुत अनुभव दिया है मुझे तुमने.
अनजाने मे इस ब्लॉग पर आई थी.अपने परिचित कुश के ब्लॉग के बारे मे सोचकर नही आई थी.पूरी प्रोफाइल पढ़ी आश्चर्य वहाँ लिखे 'कुश शर्मा' को फिर भी नही पढा था.मेरा उपर वाला संदेश कुश को नही Kthelwo को है हा हा हा
मेरा कृष्णा भी जाने कब किस रूप मे आ जाये इसलिए........ सबमे उसे ढूंढती हूँ.पर.......... पहचान नही पाती.पर वो मेरे मन को भांप इच्छाएं पूरी कर देता है.मैं ठहरी पागल.......समझ नही पाती क्या करूं?ऐसिच हूँ मैं तो

ktheLeo ने कहा…

@ इन्दु पुरी जी,
आपके इस Comments से थोडा और भ्रम हो गया है! मुझे ऐसा लगता है,आप मुझे एक और "कुश जी" जो कि "कुश की कलम’ से नामक Blog लिखते हैं के साथ confuse कर रहीं हैं!मेरा वास्त्विक नाम कुश शर्मा है! परंतु रचनायें मैं ’ktheleo' के नाम से ही लिखता हूँ, भ्रम पैदा करना मेरा उद्देश्य नहीं पर यह एक व्यक्तिगत Choice है! आशा है, आप को अब सही तत्थय मालूम हो गया होगा!
एक बार पुन: "सच में" के प्रति आपके स्नेह का शुक्रिया! "सच में" पर आतें रहें!

mridula pradhan ने कहा…

bahut sunder......

indu puri ने कहा…

KEKATAS KHOOBSURAT HOTE HAIN .WO HME UNSE BHI MILA DETE HAIN JINHE HM BHEED ME DHOONDH RHE HO KISI BCHCHE KII TARAH JISKI ANGULI KISI APNE KE HATH SE CHHOOT GAI HO. YE KEKTAS TO MERA KRISHNAA HO GYA. HA HA HA

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

दुख पाकर भी क्या कोई,
खुश हो सकता है?

Wah....Vicharniy Panktiyan

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…


दुख पाकर भी क्या कोई,
खुश हो सकता है?

…शायद!


कविता प्रभावशाली है… … …
हार्दिक बधाई !
लेकिन क्या कैक्टस दुख पाने के लिए जाना जाता है?

- राजेन्द्र स्वर्णकार

Sunil Kumar ने कहा…

आपका ब्लॉग पहली बार देखा गलती मेरी है क्षमा चाहूँगा| केक्टस की बिम्ब लेकर इतनी सुंदर रचना विरले ही रच पाते है ........

ktheLeo ने कहा…

@ सुनील जी,
आप "सच में" के काफ़ी समय पहले से प्रशंसक हैं! आप मेरे ब्लोग की Follower पट्टिका पर भी मौजूद हैं कोई बात नहीं एक बार फ़िर आपका स्वागत है! "सच में" के प्रति प्रेम बनायें रखें!

ktheLeo ने कहा…

@ राजेन्द्र जी,
यही तो मुद्दा है जो जीवन भर कांटों मे रहकर भी, यदा कदा ही सही फ़ूल तो देता है, दुख पाने के लिये नही जाना जाता!
और वो जो रोज़ फ़ूलों की सेज़ पर सोते हैं एक दिन अगर पंखुरी भी चुभ जाये तो शिकायत करते हैं!!

Navin C. Chaturvedi ने कहा…

अच्छी कविता, फोटो भी सुंदर सुंदर छांटे हैं

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

कहते है कि कैक्टस जैसे काँटो वाले पौधे घर में नहीं होने चाहिए

दिनेश पारीक ने कहा…

आप की रचना बड़ी अच्छी लगी और दिल को छु गई
इतनी सुन्दर रचनाये मैं बड़ी देर से आया हु आपका ब्लॉग पे पहली बार आया हु तो अफ़सोस भी होता है की आपका ब्लॉग पहले क्यों नहीं मिला मुझे बस असे ही लिखते रहिये आपको बहुत बहुत शुभकामनाये
आप से निवेदन है की आप मेरे ब्लॉग का भी हिस्सा बने और अपने विचारो से अवगत करवाए
धन्यवाद्
दिनेश पारीक
http://dineshpareek19.blogspot.com/
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

संजय भास्कर ने कहा…

कैक्टस जैसा होना बड़े जिगरे काम है

संजय भास्कर
आदत....मुस्कुराने की
http://sanjaybhaskar.blogspot.com