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Saturday, March 9, 2013

खता किसकी!



मुझे बस इतना बताते जाते,
क्यूँ मुस्कुराते थे,तुम आते जाते!

शब-ए-इंतेजार मुख्तसर न हूई,
दम मगर जाता रहा तेरे आते आते।

तिश्‍नगी लब पे मकीं हो गई,
तेरी जुल्फों की घटा छाते छाते।

दर-ए-दुश्मन था,और मयखाना
गम के मारे बता किधर जाते?

तेरा घर मेरी गली के मोड पे था, रास्ते भला कैसे जुदा हो पाते?


16 comments:

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    1. शुक्रिया! मन्टू जी.

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  2. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (10-03-2013) के चर्चा मंच 1179 पर भी होगी. सूचनार्थ

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    1. आपका शुक्रिया इस सम्मान के लिये.

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    1. शुक्रिया, नवाजिश!

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  4. बढ़िया प्रस्तुति-
    शुभकामनायें -
    हर हर बम बम

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    1. आपका धन्यवाद!

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ !
    सादर

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

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    1. शुक्रिया, नवाजिश!

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  6. ham bhi aa hi gaye aapki charcha par
    alag alag rachnaon par jate jate

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    1. आपका स्वागत है, अपनें विचारों की धारा से सींचिये ख्यालों के इस उपवन को!

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  7. सुंदर प्रस्तुति. अनुपम भाव.

    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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    1. रचना जी आप का "सच में" पर आना काफ़ी समय बाद हुया! सादर धन्यवाद!

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  8. वाह ...बहुत खूब ख्याल है आतेजाते
    इस पर भी एक नजर .....आपका स्वागत है ....
    http://shikhagupta83.blogspot.in/2013/03/blog-post_9.html

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  9. बढ़िया प्रस्तुति ,आप भी मेरे ब्लोग्स का अनुशरण करे ,ख़ुशी होगी
    latest postअहम् का गुलाम (दूसरा भाग )
    latest postमहाशिव रात्रि

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